साम,दान,दण्ड,भेद ये चार उपाय का रहस्य वास्तव में क्या है ?
आचार्य चाणक्य ने कौटिल्य अर्थशास्त्र में द्वितीय अधिकार में शासनाधिकार नामक प्रकरण में साम,दान,दण्ड,और भेद ये चार उपाय दिये है । जो हमारे जीवन में अति महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों को पूरा करते है तथा हमारी प्रगति में सहायक बनते है ।
सूत्र :- उपायाः सामोपप्रदानभेददण्डाः ।
१] साम :- साम के पांच प्रकार है ।
१) गुण संकीर्तन :- वंश,शरीर,कार्य,स्वभाव,विद्वत्ता,हाथी,घोड़े आदि के गुणों और अवगुणों को जानकर उनकी प्रशंसा करना ही गुण संकीर्तन है ।
२) सम्बन्धोपाख्यान :- सामानकुल,विवाह,गुरु-शिष्य,पुरोहित-यजमान,वंशपरम्परागत,हार्दिक और मैत्रीपूर्ण आदि सात प्रकार के सम्बन्धो में से किसी एक का कथन करना सम्बन्धोपाख्यान है ।
३) परस्परोपकार संदर्शन :- परस्पर एक दुसरे द्वारा दिए गए उपकार का कथन करना परस्परोपकार संदर्शन कहलाता है।
४) आयतिप्रदर्शन :- इस कार्य को करने में हम दोनों को ऐसा फल प्राप्त होगा ऐसी आशा करना आयतिप्रदर्शन है ।
५) आत्मोपनिधान :- “जो में हूँ,वहीं आप है तथा मेरा धन हि तुम्हारा धन है,उसे आप ईच्छानुसार अपने कार्य में लगा सकते है । इस आत्म समर्पण की भावना को आत्मोपनिधान कहते है ।
२] दान :- धन आदि के द्वारा उपकार करना दान और उपप्रदान है।
सूत्र :- उपप्रदानमर्थोपकारः ।
३] भेद :- शत्रु के ह्रदय में शंका भर देना भेद है।
सूत्र :- शङ्काजननं निर्भत्सनं च भेदः ।
४] दण्ड :- उसे मार देना,उसको पीड़ा पहुँचाना या उसके धन का अपहरण करना दण्ड कहलाता है ।
सूत्र :- वधः परिक्लेशो अर्थहरणं दण्ड इति ।
आचार्य चाणक्य ने कौटिल्य अर्थशास्त्र में द्वितीय अधिकार में शासनाधिकार नामक प्रकरण में साम,दान,दण्ड,और भेद ये चार उपाय दिये है । जो हमारे जीवन में अति महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों को पूरा करते है तथा हमारी प्रगति में सहायक बनते है ।
सूत्र :- उपायाः सामोपप्रदानभेददण्डाः ।
१] साम :- साम के पांच प्रकार है ।
१) गुण संकीर्तन :- वंश,शरीर,कार्य,स्वभाव,विद्वत्ता,हाथी,घोड़े आदि के गुणों और अवगुणों को जानकर उनकी प्रशंसा करना ही गुण संकीर्तन है ।
२) सम्बन्धोपाख्यान :- सामानकुल,विवाह,गुरु-शिष्य,पुरोहित-यजमान,वंशपरम्परागत,हार्दिक और मैत्रीपूर्ण आदि सात प्रकार के सम्बन्धो में से किसी एक का कथन करना सम्बन्धोपाख्यान है ।
३) परस्परोपकार संदर्शन :- परस्पर एक दुसरे द्वारा दिए गए उपकार का कथन करना परस्परोपकार संदर्शन कहलाता है।
४) आयतिप्रदर्शन :- इस कार्य को करने में हम दोनों को ऐसा फल प्राप्त होगा ऐसी आशा करना आयतिप्रदर्शन है ।
५) आत्मोपनिधान :- “जो में हूँ,वहीं आप है तथा मेरा धन हि तुम्हारा धन है,उसे आप ईच्छानुसार अपने कार्य में लगा सकते है । इस आत्म समर्पण की भावना को आत्मोपनिधान कहते है ।
२] दान :- धन आदि के द्वारा उपकार करना दान और उपप्रदान है।
सूत्र :- उपप्रदानमर्थोपकारः ।
३] भेद :- शत्रु के ह्रदय में शंका भर देना भेद है।
सूत्र :- शङ्काजननं निर्भत्सनं च भेदः ।
४] दण्ड :- उसे मार देना,उसको पीड़ा पहुँचाना या उसके धन का अपहरण करना दण्ड कहलाता है ।
सूत्र :- वधः परिक्लेशो अर्थहरणं दण्ड इति ।



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