वास्तव में विद्या क्या है ? कितनी है ? और इनसे लाभ क्या है ?
विद्या का अर्थ अनुभवजन्य ज्ञान प्राप्त करना है ।
शुक्राचार्य :- दण्डनीति । बृहस्पति :- वार्ता और दण्डनीति । मनु :- त्रयी,वार्ता और दण्डनीति ।
सूत्र :- आन्वीक्षकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्चेति विद्या: ।
किन्तु आचार्य चाणक्य के अनुसार विद्या चार है । आन्वीक्षकी,त्रयी,वार्ता और दण्डनीति ।
सूत्र :- साङ्ख्यं योगो लोकायतं चेत्यान्वीक्षकी ।
१) आन्वीक्षकी :- सांख्य,योग और लोकायत
अर्थात् नास्तिक दर्शन(जैनद.,बौध्दद.,चार्वाकद.) ये आन्वीक्षकी के अंतर्गत है । ये सब विद्याओं का प्रदीप,सभी कार्यो का साधन तथा सब धर्मो का आश्रय मानी गई है | सुख दुःख में बुध्धि को स्थिर करती है । सोचने विचारने बोलने तथा कार्य करने में सक्षम बनाती है ।
सूत्र :- सामर्ग्यजुर्वेदास्त्रयी ।
२) त्रयी :- त्रयीमें धर्म-अधर्म का ज्ञान प्रतिपादित है । साम,ऋक्,यजु इन तीनो वेदों का समन्वय हि त्रयी है । प्रत्येक वर्ण(ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शुद्र) तथा चार आश्रम(ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ,संन्यास) अपने अपने कर्तव्य पालन के साथ दया,क्षमा,सत्य,अहिंसा तथा पवित्रता आदि मूल्यों का नियमित पालन करनेवाली प्रजा सदा सुखी रहती है ।
सूत्र :- कृषिपाशुपाल्ये वाणिज्या च वार्ता ।
३) वार्ता :- वार्ता में अर्थ-अनर्थ का ज्ञान प्रतिपादित है । कृषि,पशुपालन और व्यापर वार्ता के अंतर्गत है । इनके द्वारा प्रजा धन्य,पशु,हिरण्य,ताम्र और नोकर प्राप्त करती है । इस विद्या से उपार्जित कोश और सेना के बलपर राजा परपक्ष और स्वपक्ष को वशमें करती है ।
सूत्र :- आन्विक्षकीत्रयीवार्तानां योगक्षेमसाधनो दण्डः । तस्य नीतिर्दण्डनीति: ।
४) दण्डनीति :- सुशाशन-दु:शासन का ज्ञान प्रतिपादित है ।आन्वीक्षकी आदि तिन विद्याओ की सुख-समृद्धि दण्ड पर ही निर्भर है । राजा की दण्ड व्यवस्था से चारो वर्ण,आश्रम,सारा लोक,स्व स्व कार्योको करने के साथ हि निरंतर मर्यादा बनाये रखते है ।
विद्या का अर्थ अनुभवजन्य ज्ञान प्राप्त करना है ।
शुक्राचार्य :- दण्डनीति । बृहस्पति :- वार्ता और दण्डनीति । मनु :- त्रयी,वार्ता और दण्डनीति ।
सूत्र :- आन्वीक्षकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्चेति विद्या: ।
किन्तु आचार्य चाणक्य के अनुसार विद्या चार है । आन्वीक्षकी,त्रयी,वार्ता और दण्डनीति ।
सूत्र :- साङ्ख्यं योगो लोकायतं चेत्यान्वीक्षकी ।
१) आन्वीक्षकी :- सांख्य,योग और लोकायत
अर्थात् नास्तिक दर्शन(जैनद.,बौध्दद.,चार्वाकद.) ये आन्वीक्षकी के अंतर्गत है । ये सब विद्याओं का प्रदीप,सभी कार्यो का साधन तथा सब धर्मो का आश्रय मानी गई है | सुख दुःख में बुध्धि को स्थिर करती है । सोचने विचारने बोलने तथा कार्य करने में सक्षम बनाती है ।
सूत्र :- सामर्ग्यजुर्वेदास्त्रयी ।
२) त्रयी :- त्रयीमें धर्म-अधर्म का ज्ञान प्रतिपादित है । साम,ऋक्,यजु इन तीनो वेदों का समन्वय हि त्रयी है । प्रत्येक वर्ण(ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शुद्र) तथा चार आश्रम(ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ,संन्यास) अपने अपने कर्तव्य पालन के साथ दया,क्षमा,सत्य,अहिंसा तथा पवित्रता आदि मूल्यों का नियमित पालन करनेवाली प्रजा सदा सुखी रहती है ।
सूत्र :- कृषिपाशुपाल्ये वाणिज्या च वार्ता ।
३) वार्ता :- वार्ता में अर्थ-अनर्थ का ज्ञान प्रतिपादित है । कृषि,पशुपालन और व्यापर वार्ता के अंतर्गत है । इनके द्वारा प्रजा धन्य,पशु,हिरण्य,ताम्र और नोकर प्राप्त करती है । इस विद्या से उपार्जित कोश और सेना के बलपर राजा परपक्ष और स्वपक्ष को वशमें करती है ।
सूत्र :- आन्विक्षकीत्रयीवार्तानां योगक्षेमसाधनो दण्डः । तस्य नीतिर्दण्डनीति: ।
४) दण्डनीति :- सुशाशन-दु:शासन का ज्ञान प्रतिपादित है ।आन्वीक्षकी आदि तिन विद्याओ की सुख-समृद्धि दण्ड पर ही निर्भर है । राजा की दण्ड व्यवस्था से चारो वर्ण,आश्रम,सारा लोक,स्व स्व कार्योको करने के साथ हि निरंतर मर्यादा बनाये रखते है ।

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