आज तिथि आषाढ़ शुक्ल एकादशी और श्रीविष्णु शयनोत्सव इसी दिन से भगवान श्री हरि विष्णु चार मास तक शयन करते हैं। इस समय में योग्य आहार, विहार अनिवार्य है। इसलिए कई लोग चातुर्मास्य व्रत भी करते है।
चातुर्मास्य व्रत क्या है?
आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी पर्यंत जीवन जीने की दिनचर्या में किए जाने वाले कुछ अच्छे कार्य के प्रति दृढ़ संकल्प और कुछ पदार्थ, द्रव्य या व्यसन का त्याग तथा प्रभु के प्रति समर्पण।
चातुर्मास्य व्रत किनको करना चाहिए?
सभी लोग ये व्रत कर सकते है, सन्यासी भी ये व्रत करते है।
रोगी, बालक, वृद्ध और जिन्हें नियमित रुप से शारीरिक क्रिया में कार्य करने होते है वह ये व्रत नहीं करे तो अच्छा है ।
चतुर्मास तक आहार में क्या लिया जाए?
आहार में हविष्यान्न श्रेष्ठ माना गया है, हविष्यान्न संपन्न व्रत नहीं कर सकते तो केवल आहार में जो वर्जित पदार्थ है उसका सेवन न करके भी व्रत संपन्न कर सकते है ।
वर्जित पदार्थ कौन है ?
श्रावण मास में शाक, भाद्रपद मास में दही, आश्विन मास में दूध और कार्तिक में द्विदल वाले धान्य वर्जित है ।
हविष्यान्न में किन पदार्थ ग्राह्य है?
चावल, मग, जौ, तिल, गेहूं, कागुनी, कमल ककड़ी, मूली, सूरन आदि कंद, सैंधा और समुद्र का नमक, सिर्फ गौ का दूध, दही, घी और कटहल, आम और नारियेल, हरड़, पीपर, जीरा, सौंठ, इमली, केला, आंवला, शक्कर, गुड़, ये सभी पदार्थ तेल में पकाएं गए न हो तो हविष्यान्न कहे गए है। गौ का घी न मिलने पर ही विकल्प से माहिषी का घी ले सकते है।
विशेष काम्य प्रयोजन से भी आप इन पदार्थो का त्याग कर सकते है ।
जैसे गुड़ का त्याग से स्वर मधुरता, तेल के त्याग से शरीर सुंदरता, घी का त्याग शरीर कोमलता ऐसे कई सारे पदार्थ है।जिसे आप एक नए ब्लॉग के माध्यम से जान सकते है ।
व्रत विधि में संकल्प से लेकर कई अधिक नियम करने होते हैं तो आप व्रत विधि पूजा संकल्प के लिए समीप में निवास करने वाले पंडितजी से संपर्क करे।
संदर्भ ग्रंथ ~ धर्मसिंधु
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धन्यवाद ।

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