विप्रजन्मरहस्यम् :-
विप्र जन्म क्यों श्रेष्ठ है ?
मनुस्मृति में कहा गया है,
“ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामधिजायते |
ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये ||
अर्थात् ब्राह्मण जन्म से हि पृथ्वी उपर श्रेष्ठ होता है, साथ हि ईश्वरने ब्राह्मण को हि धर्म की रक्षा का कार्य भी सोपा हुआ है |
“उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्येष्ठो यद् ब्रह्मनश्चैव धारणात् |
सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः ||
भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः |
बुध्धिमत्सु नराः श्रेष्ठाः नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ||
उत्तम अंगो से हि ब्राह्मण की उत्पत्ति हुई है तथा वेद को धारण किये हुए है,इस पञ्च महाभूत की सृष्टि में प्राणी श्रेष्ठ है उसमे भी बुध्धिमान जीव श्रेष्ठ है उस बुध्धिमान जीवो में भी मनुष्य श्रेष्ठ है और मनुष्यों में भी ब्राहमण श्रेष्ठ है।
“ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्..... ||” (वाज.३१|११)
ब्राह्मण ईश्वरका मुख है |
“देवाधीनं जगत्सर्वं मन्त्रधीनाश्च देवताः |
ते मन्त्राः ब्राह्मणाधीना ब्राह्मणो मम दैवतम् || (भागवतपु.)
सम्पूर्ण जगत देवता के आधीन है,वह देवता मंत्रो के आधीन है,वह मन्त्र ब्राह्मणों के आधीन है वह ब्राह्मण में हि हूँ |
पृथ्वी में जितने तीर्थ है,वह सभी सागर में है | सागर में जितने तीर्थ है, वह सभी ब्राह्मणों के दक्षिण पैर में होते है तथा ब्राह्मणों को नमन करने से हि सभी पापो से मुक्ति मिलती है और उनके पवित्र मंत्रो से हि मलिन व्यक्ति भी पवित्र हो जाता है |
तो फिर ब्राह्मणों मे श्रेष्ठता की हानि क्यों दिखाई देती है ?
क्योकि मनुष्य सत्व रज और तम इन तीनो गुणोंसे प्रभावित होकर सात्विकी राजसी और तामसिक वृत्ति को अपनाता है और वृत्ति की प्रबलता के कारण वैसे हि कर्म करता जिनका फल भी वैसा हि मिलता है और,
“विप्रो वृक्षः मूलकान्यत्र संध्या
वेदाः शाखाः धर्मकर्माणि पत्रम् |
तस्मान्मूलम्यत्नतो रक्षणीयं
छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ||
विप्र अर्थात् ब्राह्मण रूपी जो वृक्ष है, उसका मूल संध्या है और शाखाये वेद तथा धर्म और कर्म ये पत्र है, अतः मूल यानि संध्या की प्रयत्न पूर्वक रक्षा करनी चाहिये क्योकि मूल के बिना शाखा और पत्र दोनो स्वतः ही नष्ट हो जाते है |
" अनभ्यासेन वेदानाम् आचारस्य च वर्जनात्।
आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्रान् जिघाँसति।। "
वेदों का अभ्यास न करने से, आचार का पालन न करने से, आलस्य तथा अन्न दोष से मृत्यु ब्राह्मण का भी नाश करती है।
विप्र जन्म क्यों श्रेष्ठ है ?
मनुस्मृति में कहा गया है,
“ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामधिजायते |
ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये ||
अर्थात् ब्राह्मण जन्म से हि पृथ्वी उपर श्रेष्ठ होता है, साथ हि ईश्वरने ब्राह्मण को हि धर्म की रक्षा का कार्य भी सोपा हुआ है |
“उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्येष्ठो यद् ब्रह्मनश्चैव धारणात् |
सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः ||
भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः |
बुध्धिमत्सु नराः श्रेष्ठाः नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ||
उत्तम अंगो से हि ब्राह्मण की उत्पत्ति हुई है तथा वेद को धारण किये हुए है,इस पञ्च महाभूत की सृष्टि में प्राणी श्रेष्ठ है उसमे भी बुध्धिमान जीव श्रेष्ठ है उस बुध्धिमान जीवो में भी मनुष्य श्रेष्ठ है और मनुष्यों में भी ब्राहमण श्रेष्ठ है।
“ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्..... ||” (वाज.३१|११)
ब्राह्मण ईश्वरका मुख है |
“देवाधीनं जगत्सर्वं मन्त्रधीनाश्च देवताः |
ते मन्त्राः ब्राह्मणाधीना ब्राह्मणो मम दैवतम् || (भागवतपु.)
सम्पूर्ण जगत देवता के आधीन है,वह देवता मंत्रो के आधीन है,वह मन्त्र ब्राह्मणों के आधीन है वह ब्राह्मण में हि हूँ |
पृथ्वी में जितने तीर्थ है,वह सभी सागर में है | सागर में जितने तीर्थ है, वह सभी ब्राह्मणों के दक्षिण पैर में होते है तथा ब्राह्मणों को नमन करने से हि सभी पापो से मुक्ति मिलती है और उनके पवित्र मंत्रो से हि मलिन व्यक्ति भी पवित्र हो जाता है |
तो फिर ब्राह्मणों मे श्रेष्ठता की हानि क्यों दिखाई देती है ?
क्योकि मनुष्य सत्व रज और तम इन तीनो गुणोंसे प्रभावित होकर सात्विकी राजसी और तामसिक वृत्ति को अपनाता है और वृत्ति की प्रबलता के कारण वैसे हि कर्म करता जिनका फल भी वैसा हि मिलता है और,
“विप्रो वृक्षः मूलकान्यत्र संध्या
वेदाः शाखाः धर्मकर्माणि पत्रम् |
तस्मान्मूलम्यत्नतो रक्षणीयं
छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ||
विप्र अर्थात् ब्राह्मण रूपी जो वृक्ष है, उसका मूल संध्या है और शाखाये वेद तथा धर्म और कर्म ये पत्र है, अतः मूल यानि संध्या की प्रयत्न पूर्वक रक्षा करनी चाहिये क्योकि मूल के बिना शाखा और पत्र दोनो स्वतः ही नष्ट हो जाते है |
" अनभ्यासेन वेदानाम् आचारस्य च वर्जनात्।
आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्रान् जिघाँसति।। "
वेदों का अभ्यास न करने से, आचार का पालन न करने से, आलस्य तथा अन्न दोष से मृत्यु ब्राह्मण का भी नाश करती है।
Very good friend
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